(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

आश्वमेधिकपर्व


॥ श्रीः ॥
14.69. अध्यायः 069
Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Topics
कृष्णेन सशपथं संस्पर्शनेन परिक्षितः समुज्जीवनम्॥ 1 ॥
Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच।

सैवं विलप्य करुणं सोन्मादेव तपस्विनी।
उत्तरा न्यपतद्भूमौ कृपणा पुत्रगृद्धिनी॥ 14-69-1(94396)
तां तु दृष्ट्वा निपतितां हतपुत्रपरिच्छदाम्।
चुक्रोश कुन्ती दुःखार्ता सर्वाश्च भरतास्त्रियः॥ 14-69-2(94397)
मुहूर्तमिव राजेन्द्र पाण्डवानां निवेशनम्।
अप्रेक्षणीयमभवदार्तस्वनविनादितम्॥ 14-69-3(94398)
सा मुहूर्तं च राजेन्द्र पुत्रशोकाभिपीडिता।
कश्मलाभिहता वीर वैराटी त्वभवत्तदा॥ 14-69-4(94399)
प्रतिलभ्य तु सा संज्ञामुत्तरा भरतर्षभ।
अङ्कमारोप्य तं पुत्रमिदं वचनमब्रवीत्॥ 14-69-5(94400)
धर्मज्ञस्य सुतः संस्त्वं न धर्ममवबुध्यसे।
यस्त्वं वृष्णिप्रवीरस्य कुरुषे नाभिवादनम्॥ 14-69-6(94401)
पुत्र गत्वा मम वचो ब्रूयास्त्वं पितरं त्विदम्।
दुर्मरं प्राणिनां वीर काले प्राप्ते कथञ्चन॥ 14-69-7(94402)
याऽहं त्वया विनाऽद्येह पत्या पुत्रेण चैव ह।
मरणं नाभिगच्छामि हतस्वस्तिरकिञ्चना॥ 14-69-8(94403)
अथवा धर्मराज्ञाऽहमनुज्ञाता महाभुजः।
भक्षयिष्ये विषं घोरं प्रवेक्ष्ये वा हुताशनम्॥ 14-69-9(94404)
अथवा दुर्भरं तात यदिदं मे सहस्रधा।
पतिपुत्रविहीनाया हृदयं न विदीर्यते॥ 14-69-10(94405)
उत्तिष्ठ पुत्र पस्येमां दुःखितां प्रपितामहीम्।
आर्तामुपप्लुतां दीनां निमग्नां शोकसागरे॥ 14-69-11(94406)
आर्यां च पश्य पाञ्चालीं सात्वतीं च तपस्विनीम्।
मां च पश्य सुदुःखार्तां व्याधविद्धां मृगीमिव॥ 14-69-12(94407)
उत्तिष्ठ पश्य वदनं लोकनाथस्य धीमतः।
पुण्डरीकपलाशाक्षं पुरेव चपलेक्षणः॥ 14-69-13(94408)
एवं विप्रलपन्तीं तु दृष्ट्वा निपतितां पुनः।
उत्तरां तां स्त्रियः सर्वाः पुनरुत्थापयन्त्युत॥ 14-69-14(94409)
उत्थाय च पुनर्धैर्यात्तदा मत्स्यपतेः सुता।
प्राञ्जलिः पुण्डरीकाक्षं भूमावेवाभ्यवादयत्॥ 14-69-15(94410)
श्रुत्वा स तस्या विपुलं विलापं पुरुषर्षभः।
उपस्पृश्य ततः कृष्णो ब्रह्मास्त्रं प्रत्यसंहरत्॥ 14-69-16(94411)
प्रतिजज्ञे च दाशार्हस्तस्य जीवितमच्युतः।
अब्रवीच्च विशुद्धात्मा सर्वं विश्रावयज्जगत्॥ 14-69-17(94412)
न ब्रवीम्युत्तरे मिथ्या सत्यमेतद्भविष्यति।
एष संजीवयाम्येनं पश्यतां सर्वदेहिनाम्॥ 14-69-18(94413)
नोक्तपूर्वं मया मिथ्या स्वैरेष्वपि कदाचन।
न च युद्धात्परावृत्तस्तथा संजीवतामयम्॥ 14-69-19(94414)
यथा मे दयितो धर्मो ब्राह्मणश्च विशेषतः।
अभिमन्योः सुतो जातो मृतो जीवत्वयं तथा॥ 14-69-20(94415)
यथाऽहं नाभिजानामि विजये तु कदाचन।
विरोधं तेन सत्येन मृतो जीवत्वयं शिशुः॥ 14-69-21(94416)
यथा सत्यं च धर्मश्च मयि नित्यं प्रतिष्ठितौ।
तथा मृतः शिशुरयं जीवतादभिमन्युजः॥ 14-69-22(94417)
यथा कंसश्च केशी च धर्मेण निहतौ मया।
तेन सत्येन बालोऽयं पुनः संजीवतामिह॥ 14-69-23(94418)
इत्युक्त्वा वासुदेवोऽथ तं बालं भरतर्षभ।
`पादेन कमलाभेन ब्रह्मरुद्रार्चितेन च।
पस्पर्श पुण्डरीकाक्ष आपादतलमस्तकम्॥ 14-69-24(94419)
स्पृष्टमात्रस्तु कृष्णेन स बालो भरतर्षभ।
शनैःशनैर्महाराज प्रापद्यत स चेतनाम्॥' 14-69-25(94420)
शनैःशनैर्महाराज प्रास्पन्दत सचेतनः॥ ॥ 14-69-26(94421)

इति श्रीमन्महाभारते आश्वमेधिकपर्वणि अनुगीतापर्वणि एकोनसप्ततितमोऽध्यायः॥ 69 ॥

Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Footnotes
7-69-6 धर्मजस्य सुत इति क.थ.पाठः॥


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